Saturday, April 30, 2011


नानी माँ



I was in Delhi for my post graduate studies when Nani Maa left us for her heavenly abode. Nana told me that the last words she spoke were: "She miss Me alot". I wish I was there when she breathed her last. This poem is for my Nani Maa

I love u Nani Maa...
नानी माँ की
हथपोई रोटियों का
जवाब नही था

आँगन के चूल्हे में सिकीं
गरम-गरम हथपोइयों के कौर
हमारे मुहँ में ऐसे पिघलते
जैसे कंडी की धीमी आँच पर
घंटों तक सींझे, लाल दूध से बने
घी और मक्खन की महकती बूंदें

गर्मी की छुट्टी में
जब हम गांव जाते
तो आंखें सबसे पहले
नानी माँ को ढूंढ़तीं
दलान से लगे किंवाड़
से झाँक कर देखते
तो नानी माँ
अपनी सूती धोती पहने
या तो दही मथ रही होतीं
या फिर
आँगन में छन कर आई धूप में
खटाई डाल रही होतीं
हम जोर से चिल्लाते -
"नानी माँ, नानी माँ"
नानी माँ की आंखें चमक उठतीं
और हमेशा की तरह हँस कर कहतीं -
"लागत है अनु आइ गै"

फिर तो गर्मी की छुट्टी खूब मज़े से कटती
चाहे खरही पर चढ़ कर
कलमी पेड़ से आम तोड़ने की सनक हो
या भरी दोपहरी में छिछला खाने की ललक
चाहे गेहूं की देहरी में आम छिपाने की कोशिश
या फिर हथपोई पर सबसे ज़्यादा घी डलवाने की होड़
नानी माँ हर बार हमें बड़ों की डांट से बचातीं

हम बड़े हो गए
पढ़ने के लिए और दूर चले गए
धीरे-धीरे गांव छूट गया

सालों बाद फिर गांव जाना हुआ
खरही के पास वाला पेड़ अब नही था
घर की देहरी बँट गई थी
मिट्टी का चूल्हा तोड़ कर
छुटके बाबू और बड़के
गैस- सिलेंडर लगा लिया था

दलान के किंवाड़ से
अन्दर झांकने की हिम्मत न हुई
नानी माँ की यादों से भरा
वह आँगन अब सूना था..

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